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हिंदी सिनेमा में पौराणिक हिंदी फिल्मों का विकासः आधुनिक परिप्रेक्ष्य

डॉ0 अंजली त्यागी, असिस्टेंट प्रोफेसर, गृह विज्ञान विभाग, श्री अग्रसेन कन्या पी0जी0 कॉलेज वाराणसी हिमांशु कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, बयालिसी पी. जी. कॉलेज जलालपुर, जौनपुर DOI: 10.64127/Shodhpith.2025v1i6001 DOI URL: https://doi.org/10.64127/10.64127/Shodhpith.2025v1i6001
Published Date: 02-11-2025 Issue: Vol. 1 No. 6 (2025): November - December 2025 Published Paper PDF: Download

शोध सार- भारतीय समाज में पौराणिक कथाएं सदैव समाज के धार्मिक, नैतिक, दार्शनिक व सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिनिध् िात्व करने वाली रही है। भारतीय सिनेमा में इन पौराणिक कथाओं का समावेश प्रारंभिक काल से ही होता रहा है । दादा साहब फाल्के निर्मित राजा हरिश्चंद्र (1913 )से प्रारंभ होकर यह परंपरा स्वतंत्रता पूर्व काल में धार्मिक आदर्श एवं नैतिकता के उच्च आदर्शों के प्रचार प्रसार एवं स्वातंर्त्योत्तर काल में राष्ट्रीय चेतना के निर्माण हेतु सतत गति से गतिमान है। 1970 ई० से 2000 ई० के मध्य टेलीविजन धारावाहिकों जैसे रामायण एवं महाभारत ने इन आख्यानों को घर-घर पहुंचने का कार्य किया। सन 2000 ई० के बाद तकनीकी प्रगति ,एनीमेशन और 3क् ग्राफिक्स ने पौराण् िाक कथाओं को नए आयाम प्रदान किये ,जिसमें धार्मिक एवं नैतिक उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के साथ-साथ व्यावसायिक एवं मनोरंजन परक प्रवृत्तियों के दर्शन भी होते हैं ।प्रस्तुत शोध पत्र हिंदी सिनेमा में पौराणिक आख्यानों की प्रस्तुति और उनके परिवर्तित स्वरूप का विश्लेषण करता है साथ ही साथ यह भी दर्शाता है कि सिनेमा का दायित्व केवल मनोरंजन तक सीमित न होकर समाज में धर्म, संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों की स्थापना भी है।

की-वर्ड्स: पौराणिक कथाएं, संस्कृति, लोक कथाएं, नैतिक मूल्य, महाकाव्य ं, धारावाहिक, सिनेमा.


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